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क्या निजी कोचिंग का व्यवसाय फायदेमंद है

खास तरह से दी गई शिक्षा, वक्त की जरूरत है। लोगों की खर्च करने योग्य (हाई डिस्पोजेबल) कमाई बढ़ गई है। इस बात का उस जरूरत से कोई सम्बन्ध नहीं है।

By Feature writer
क्या निजी कोचिंग का व्यवसाय फायदेमंद है

आंकड़ा पढ़ने पर चौंकिए मत- बच्चों के समूह को निजी रूप से सिखाने का ट्यूशन व्यवसाय  आज $6.5 बिलियन का उद्योग है। बच्चों के भविष्य के प्रति सजग कई पालक अपने बच्चों को प्राइवेट ट्यूशन भेजने को महत्व दे रहे हैं। स्कूल और कॉलेजों में सही ढंग से नहीं सिखाने के पीछे एक कारण हो सकता है। हालात कुछ ऐसे हैं कि कहीं-कहीं 5 वर्ष के बालकों को भी ट्यूशन भेजा जा रहा है। आंकड़ें बताते हैं कि शिक्षा के इस तरीके का महत्व इतना बढ़ गया है कि अब ये 'भारतीय छात्रों के जीवनशैली का प्रमुख भाग' बन गई है। वैश्विक स्तर पर निजी ट्यूटरिंग बाजार 2018 में $ 102.8 बिलियन के आंकड़े को पार कर जाएगा।

चुनौती या वरदान?

भारत के कुल छात्रों में से लगभग 83% के लिए निजी कोचिंग समय की जरूरत बन गया है। इसका दूसरा पहलू ये है कि इससे छोटे-मोटे ट्यूशन सेंटर्स और निजी संस्थानों के हाथ मानो खजाने की चाबी लग गई है। मेट्रो शहरों में 87 प्रतिशत प्राथमिक स्कूली छात्र और 95 प्रतिशत उच्च माध्यमिक विद्यालय के छात्र निजी ट्यूशन्स के लिए जाते हैं। एसोचैम (ASSOCHAM) की रिपोर्ट के अनुसार, निजी कोचिंग अब ज्यादा पसंद किया जाने वाला तरीका बन गया है। एक तरह से उसने अब मुख्य धारा शिक्षा के क्षेत्र में भी घुसपैठ कर ली है। इसीलिए ये कहना गलत नहीं होगा कि प्राथमिक स्कूलों के ज्यादातर छात्र अब निजी ट्यूशन्स पर निर्भर रहते हैं। उनकी संख्या में 100 प्रतिशत के हिसाब से इजाफा हुआ है। कॉलेज के जो छात्र पढ़ाई में बेहतरीन प्रदर्शन देना चाहते हैं, वे भी इस मॉडल को तरजीह देते हैं। अचरज की बात नहीं है कि भारत के इस परामर्शदाता उद्योग ने पिछ्ले पांच से छः वर्षों में लगभग 35% की बढ़ोतरी दिखाई है।

 

सर्वोत्कृष्ट संस्थान

खुद के बल पर जाने-माने और लोकप्रिय हुए ब्रांड्स हैं आकाश इंस्टिट्यूट, ब्रिलियंट ट्यूटोरिअल्स, विद्यानेक्स्ट, TIME और FIITJEE। ये प्राथमिक रूप से IIM कॉमन एडमिशन टेस्ट, मैनेजमेंट एप्टिट्यूड टेस्ट, IIT जॉईंट एन्ट्रन्स एग्जाम और साथ ही GMAT, GRE, IELTS और TOEFL जैसी अंतर्राष्ट्रीय परीक्षाओं पर पूरा जोर देते हैं। जाहिर है उनकी फीस बहुत ज्यादा होती है, लेकिन वे परिणामों का शर्तिया तौर पर ऐसा यकीन दिलाते हैं, जैसे कोई वाशिंग पाउडर पहली बार खरीदते वक्त आपको दिलाया जाता है।

उदाहरण के लिए शहरों में स्तर और जगह के मुताबिक ट्यूशन फीस बदलती हैं। इसीलिए नियमित कोचिंग के लिए फीस प्रतिमाह 1,000 से 4,000 रु. के बीच कहीं भी हो सकती है। ये ग्रुप ट्यूशन के लिए अच्छी है। घर पर ही ट्यूशन या प्राइवेट ट्यूशन (जैसा कि उन्हें आम तौर पर कहा जाता है) के लिए चार्जेस 1,500 रु. प्रति घंटा प्रति विषय तक जा सकते हैं, लेकिन ये ज्यादातर उच्च माध्यमिक स्तर के लिए होते हैं।

स्कूली शिक्षा में गिरावट

असल में स्कूली शिक्षा के प्रति समाज में विश्वास की कमी आ गई है। इसके पीछे स्कूलों में शैक्षणिक कार्यों की बिगड़ती हालत ही इकलौती नहीं है। कोर्स छोड़ कर अन्य गतिविधियों पर पूरा ध्यान केंद्रित हो गया है, इस बात को उसका दोष जाना चाहिए। बंगलुरु और गुरुग्राम में कार्यरत कोचिंग क्लासेज की श्रृन्खला ‘विद्यानेक्स्ट’ के प्रमुख सुमन रामदास ने माध्यमों से बात करते हुए कहा, “शिक्षक अलग-अलग तरह की पाठ्यत्तर गतिविधियों में इतने सक्रीय हो गए हैं कि जहां पाठ्यक्रम की बात आती है वहां वे बच्चों की जरूरतों और मांगों के बारे में सजग ही  नहीं रह पाते हैं। इस वजह से उन्हें कोर्स खत्म करने की जल्दी में अध्याय छोड़ देने पड़ते हैं, जिससे कि बच्चे चकरा जाते हैं और बुनियादी विचार समझने में कच्चे रह जाते हैं।” रामदास कहते हैं कि उनका संस्थान बच्चों की पाठ्यक्रम-संबंधी जरूरतों के बारे में कहीं ज्यादा  सुसज्जित और एकाग्र है।

और एक बात ये हुई है कि दोहरी आय वाले परिवारों के कारण इस पूरी शैक्षिक प्रक्रिया में पालकों की शिरकत कम हो गई है। इकलौती पालक होने के कारण कॉर्पोरेट प्रोफेशनल निना रंजन दास को उनके 16 वर्षीय बेटे राहुल की शैक्षिक जरूरतों को लेकर उसके ट्यूशन टीचर के भरोसे बहुत ज्यादा रहना पड़ता है। वे अच्छा कमा रही हैं और खर्च करने में काबिल हैं। मौजूदा स्थिति में सिर्फ दिल्ली-एनसीआर में ही पांच लाख से अधिक निजी शिक्षक ट्यूशन क्षेत्र में काम कर रहे हैं। अंदाजा है कि ये आंकड़ा बढ़ता जा रहा है। ऐसा इसलिए कि इस व्यवसाय में कर देने की आवश्यकता ना होने के कारण कोई भी क्वालिफाइड शिक्षक ट्यूशन सेंटर चला कर महीने में 50,000 से 70,000 रु. के बीच कमा सकता है। कुछ जगह तो निजी ट्यूशन्स इतने लोकप्रिय हैं कि एक वर्ष एडवांस में ही सीटें बुक हो जाती हैं। हैदराबाद की प्रिया सुब्रह्मण्यम एक ऐसी शिक्षिका हैं। उनके अनुसार, “सिर्फ कमजोर छात्र ही ट्यूशन्स के लिए जाते हैं, यह एक बहुत बड़ी गलतफहमी है। अब निजी ट्यूशन्स का मतलब है गम्भीरता से पढ़ाई और परिणाम-केंद्रित कार्य।” वे उच्च माध्यमिक कक्षाओं के लिए विशेष रूप से एकाउंट्स ट्यूशन्स लेती हैं।

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